Friday, October 10, 2008

नारी मन.........


नारी मन को मन समझ न पाया ,
है कैसी दुविधा यह कैसी माया ?
तू है सारे जग की जननी ,
तुझमे ही है विनाश की छाया ।
जिसने भी तुझ से हाथ मिलाया ,
कभी हाथ जलाया ,कभी हाथ गंवाया ।
जिसने भी तुझको शीश नवाया ,
कभी आशीष मिला ,कभी प्यार है पाया।
जिसने भी तुझको आँख दिखायी ,
रौद्र रूप काली को पाया ।
तू चलती फिरती मधुशाला ,
लेकिन दिल में क्यूं प्रतिशोध की ज्वाला ?
तेरे अंतर्मन में क्या है ?
उसको अब तक समझ न पाया ।
अब तू ही बता दे ,तू क्या है कौन है ?
देखती तू खूब ,लेकिन रहती क्यूं मौन है ?
सवाल पूंछता मैं मन में ,
आख़िर क्या है तेरे जेहन में ?
(यह कविता एम.ए.(प्राचीन इतिहास ) प्रथम वर्ष के दौरान लिखी )

9 comments:

Anonymous said...

wow, very special, i like it.

D said...

good one.

Anonymous said...

thats amazing story.

Amit K Sagar said...

पहलुओं के पहलू हैं. बेहतर.

शोभा said...

हा हा हा . शीर्षक पढ़कर मुझे लगा था की नारी की म्हणता का वर्णन होगा. पैर कोई बात नहीं अपना-अपना अनुभव है. सस्नेह.

Anonymous said...

ब्‍लागजगत में आपका स्‍वागत है। निरंतरता बनाए रहिएगा।

प्रदीप मानोरिया said...

सुंदर शब्द से सजी कविता आपके खूबसूरत ब्लॉग पर सैर कर आनंद हुआ आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है निरंतरता बनाए रखे
मेरे ब्लॉग पर पधार कर व्यंग कविताओं का आनंद लें
मेरी नई रचना दिल की बीमारी पढने आप सादर आमंत्रित हैं

लोकेश Lokesh said...

जिसने भी तुझ से हाथ मिलाया ,
कभी हाथ जलाया ,कभी हाथ गंवाया ।

अपना-अपना अनुभव!

Udan Tashtari said...

बढि़या रचना, बधई.